Showing posts with label Tribal community. Show all posts
Showing posts with label Tribal community. Show all posts

पंचायत (विस्तारित अनुसूचित क्षेत्र ) कायदा १९९६ च्या तरतुदी

पंचायत ( विस्तारित अनुसूचित क्षेत्र ) कायदा -- १९९६ -----च्या तरतुदी 
कायदा ४० / १९९पंचायत ६ दिनांक ४२ डिसें.१९९६ , भारतीय संसदेत पास झालेला, प्रस्तुत कायदा भारतीय संविधानाच्या IX भागातील पंचायतीच्या अनुसूची क्षेत्रासंबधीचा आहे.
 १] या कायद्यात पंचायत ( विस्तारित अनुसूचित क्षेत्र ) कायदा -- १९९६ ची तरतूद आहे.२] या कायद्यातील अनुसूचित क्षेत्र म्हणजे, भारतीय संविधानाच्या अनुच्छेद क्र. [१], कलम क्र. २४४ च्या प्रावधानातील अनुसूचित क्षेत्र होय.भारतीय सविधानाचा विस्तारित IX भाग भारतीय सविधानाचा विस्तारित IX भागातील करण्यात आलेले अपवाद आणि सुधारणा...नियम क्र. ४ A ) राज्य विधी मंडळाव्दारा मान्य पारंपारिक कायद्यान्वये सामाजिक व आर्थिक रिती रिवाजानुसार सामुहिक संसाधनाच्या पारंपारिक प्रशासकीय रिवाजानुसार प्रक्रिया निर्माण करणे.B ) ग्राम या संज्ञेत छोटे छोटे वस्तीचे खेडे, लोकसमूह किंव्हा समुदाय जो की, आपल्या परंपरा रितीरिवाजा अनुसरून दैनदिन व्यवहार पार पाडणारी प्रक्रिया होय.D ) प्रत्येक ग्राम सभा समुदायाच्या परंपरा व रीतीरिवाज, त्यांची सांस्कृतिक ओळखीचे सामुहीक संसाधन आणि पारंपारिक रितीने लवाद सोडविण्याच्या प्रक्रियेचे जतन करून ग्राम पातळीवर त्याचे संरक्षण करतील.E ) प्रत्येक ग्राम सभा ही.. i ) योजना व कार्य प्रकल्पाला मंजूर करून सामाजिक व आर्थिक सुधारणा बाबतचे प्रस्ताव कार्यान्वित करण्यास ग्राम पातळीवरून पंचायतीकडे पाठविण्यात येईल. II ) या योजने साठी लाभार्थ्याची ओळख निच्चीत करून कार्यक्रम राबवतील.F ) प्र त्येक ग्राम सभा अनु. क्र. E प्रमाणे प्रकल्प व प्रस्ताव कार्यक्रमानुसार झालेल्या खर्चाचे विवरण पंचायतीला सादर करतील.G ) प्रत्येक पंचायात अनुसूचित क्षेत्रातील आरक्षणा प्रमाणे लोकसंखेच्या आधारे संविधानाच्या, IX व्या भागाला अनुसरून आरक्षित जागा ठरवतील.आदिवासीच्या आरक्षित जागा ह्या १/२ पेक्ष्या कामू असू नये.सर्व पंचायतीचे अध्यक्षाची पदे आदिवासी साठी राखीव असतील H ) जर त्या पंचायती मध्ये आदिवासी प्रतिनिधी उपलब्ध नसेल तर, राज्य शासन इतर पंचाती मधून आदिवासी अध्यक्ष नामनिदर्शित करतील.I ) अनुचित क्षेत्रात प्रकल्प उभारणीसाठी जमीन हस्तांतरण करण्यापूर्वी, आणि पुनर्वसन करण्या साठी ग्राम सभा किंव्हा पंचायत कडून राज्य स्तरावर विचार विनिमयाचे सहकार्य घेतील. J ) लघु पाटबंदारे, पाणी वाटपाचे प्रस्ताव व्यवस्थापन पंचायत व्दारा उच्च स्तरावर घेतील.K ) अनुसूचित क्षेत्रातील लघु खनिज संबधी लाइसन्स देण्यासाठी किंव्हा माइन्स लीजसाठी, ग्राम सभा किंव्हा पंचायतची शिफारस असणे बंधनकारक असेल. L ) अनुसूचित क्षेत्रातील लघु खनिज संबधी कोणतीही लिलावाच्या वेळी सवलत देताना ग्राम सभा किंव्हा पंचायतची शिफारस बंधनकारक असेल.M ) अनुसूचित क्षेत्रातील ग्राम सभा व पंचायातीना स्वशासन उभारण्यासाठी आवश्यक असलेले अधिकार व आधिकारी देवून त्याची अंमलबजावणी साठी राज्य विधी मांडला व्दारे देखरेख ठेवेल. I ) नशेली अनुसूचित क्षेत्रातील लघु खनिज संबधी पदार्थाचे सेवन प्रतिबंद करणे व परवाने देण्या बाबतचे अधिकार.II ) लघु जंगल उत्पादित मालावरील अधिकार III ) अनुसूचित क्षेत्रातील जमिनी हडप करण्यास प्रतिबंद घालणे, किंव्हा आदिवासीच्या जमिनी हडप करण्यात आल्या असतील तर त्या परत मिळवून देण्याचे अधिकार बहाल करणे.IV ) बाजार हात बाबतचे व्यवस्थान करणे,V ) सावकारी वर नियंत्रण ठेवणे,IV ) सामाजिक क्षेत्रात कार्यरत संस्थावर नयंत्रण ठेवणे,N ) ग्राम सभेला व पंचायतीला, स्वशासानाचे संरक्षण करणारी संस्था म्हणून त्यानुसार कार्यभाग पार पडण्यासाठी अधिकार बहाल झाल्याबाबतची खात्री राज्य विधीमंडळाकडून बहाल केल्या जाईल.O ) संविधानातील ६ व्या अनुसूचीतील साकारलेल्या प्रावधानाची प्रशसकीय यंत्रणा जिल्ला पातळीवर पंचायतीना लागू करण्यास संबधी राज्य विधिमंडळ अधिकार बहाल करतील. ५] ह्या कायद्यानुसार संविधानाच्या IX भागात काही बदल व सुधारणा करून अनुसूचित क्षेत्रातील पंचायतीचा कायदा बनविण्यात आला. संविधानाच्या IX व्या भागाला हस्तक्षेप करण्याचे अधिकार मा. राष्टपतीला असल्यामुळे त्याच्या अधिकारा प्रमाणे कायद्याच्या तारखेपासून एक वर्षापर्यंत किंव्हा त्याच्या आत राज्य विधी मांडला कडून पास होई पर्यंत अबाधित राहील.

के एल मोहनपुरिया 
सचिव, भारत सरकार

निसर्गाचे पारंपारिक सोबती, आदिवासी समाजाच्या अस्तित्वाची हाक!

निसर्गाचे पारंपारिक सोबती, आदिवासी समाजाच्या अस्तित्वाची हाक!
जागतिक आदिवासी दिन ९ ऑगस्ट, दुपारी २ वाजता “डहाणू नोटिफिकेशन” कायम ठेवून पर्यावरण व स्थानिक भूमी पुत्रांचे अस्तित्व वाचवण्या साठी
प्रकृतीः रक्षति रक्षिता.
www.jago.adiyuva.in
आयोजक : सर्व आदिवासी संघटना

A. Example of Existing Structural Loss exploiting Tribal Community in Palghar
1)    NH8 Highway Widening : Land of Tribal villages being accuired
2)    High voltage Electric Towers : Land of tribal villages / Tree cut and Environmental pollution
3)    Heavy Loaded Vehicle Transport from Interior villages (Kasa- Udhava to Gujarat), Leads to huge number of accidents
4)    Urban/market wastage to Tribal Villages, polutes land and rivers
5)    Dams  : Existing Dam not used for local needs (Dhamani, Kavadas, Kurze, Sakhare, Etc)
6)    Highway/State road beside Lands are being Forcefully transferred to non tribals
7)    Huge Volume of Alcohol selling in TSP area (Legal & illegal)
8)    Huge Penetration of Religious Organizations & constructions on tribal land
9)    Waste water of urban and industrial area in river and farms
10) Forest & Natural resources are being exploited


B. Upcoming Structural Loss  for Plaghar Tribal community
1)    Mumbai Vadodara Express Highway : 60-100m Wide, 2000 – 2500 Acre farm and Tribal Villages
2)    Bullet train : Underground 80m, and wide tunnel.
3)    Special Cargo railway line 50-60 m wide
4)    Susari Dam : 13 villages
5)    Planned 5-10 dams
6)    Existing dam height increase 10-30 ft will submerge villages around dam
7)    Dapchari dairy project land has been plan to use for Pollution creating factory in Mumbai
8)    Special electricity connection from DTPS to Dapchari work started on Ambesari road
9)    Industrial corridor
10)  2 new gas pipe line & Beside 2 service roads (2 Existing pipelines)
11)  Mega Port Near Palghar coast (Vadhavan Port & Connection Mega Road to NH8)
12) Mumbai Devnar slaughter house being plan to Shift Dapchari
13) Hundred of  acre land being tranfer for Minority University in Talasari
 Supreme court observation : 40% Tribals has been forcefully relocated for Government and Private Company

Save Land Save Tribals!
Around the world ‘development’ is robbing tribal people of their land, self-sufficiency and pride and leaving them with nothing.
Watch this short, satirical film, which tells the story of how tribal peoples are being destroyed in the name of ‘development’.~
https://www.youtube.com/watch?v=uFU2iQcFv7U

जमीन लूट की गारंटी देता भूमि अधिग्रहण अध्यादेश

बुधवार, 28 जनवरी 2015
जमीन लूट की गारंटी देता भूमि अधिग्रहण अध्यादेश

http://1.bp.blogspot.com/-ZBA63b0E0mw/VMkmyj8EpEI/AAAAAAAAANY/t5hokh42cwA/s1600/PB271256.JPG

देश में तथाकथित विकास परियोजनाओं के द्वारा विस्थापित लोगों के लिए मुआवजा, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापना की मांग को लेकर लम्बे समय से चले जनांदोलनों के बदौलत भारतीय संसद ने किसान, आदिवासी रैयत एवं कृषक मजदूरों को भयभीत करनेवाला अंग्रेजों द्वारा लागू किया गया भूमि अधिग्रहण कानून 1894’‘ को खारिज करते हुए ‘‘भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनर्स्थापन में उचित प्रतिकर एवं पारदर्शिता अधिकार अधिनियम, 2013’’ पारित किया था। लेकिन दुःखद बात यह है कि नया कानून देश में ठीक से लागू भी नहीं हो पाया था कि केन्द्र की एनडीए सरकार ने भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के माध्यम से किसान, आदिवासी रैयत एवं परियोजना प्रभावित लोगों के लिए बनाया गया सुरक्षा घेरा पर सीधा हमला करते हुए इसे समाप्त कर दिया है। केन्द्र सरकार ने सामाजिक प्रभाव आॅंकेक्षण, भूमि अधिग्रहण से पहले परियोजना प्रभावित लोगों की सहमति, खाद्य सुरक्षा, सरकारी आॅफसरों को दंडित करना एवं उपयोग रहित जमीन की वापसी जैसे अति महत्वपूर्ण प्रावधानों को ही मूल कानून से दरकिनार कर दिया है, जिससे यह अध्यादेश जमीन लूट की गारंटी को सुनिश्चित करता प्रतीत होता है।

ऐसा लगता है मानो धरती का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश को चलाने वाली सरकार प्रचंड बहुमत के आड़ में लोकतंत्रिक अभावके दौर से गुजर रहा है। मैं ऐसा इसलिए कहा रहा हूँ क्योंकि जिस तरह से भूमि अधिग्रहण अध्यादेश लाया गया, वह लोकतंत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। यह अनुसूचित क्षेत्रों के लिए किये गये संवैधानिक प्रावधानों एवं आदिवासियों के परंपरिक अधिकारों को भी सिरे से खारिज करता है। केन्द्र सरकार का कहना है कि यह अध्यादेश, देश के विकास एवं किसानों के हितों के लिए फायदेमंद साबित होगा। इसलिए हमें इसपर जरूर विचार करना चाहिए कि इसे किसका भला होने वाला है। क्या इस अध्यादेश का मकसद विदेशी पूंजीनिवेश को देश में बढ़ावा देना है या जनहितके नाम पर उद्योगपतियों को सौंपे गये जमीन की रक्षा करनी है? हमें अध्यादेश लाने की प्रक्रिया एवं महत्वपूर्ण संशोधनों पर गौर करना चाहिए।



भारतीय संविधान अनुच्छेद 123(1) के द्वारा भारत के राष्ट्रपति को यह अधिकार दिया गया है कि जब संसद के दोनो सदन विश्रामकालीन अवस्था में हो और देश में ऐसी परिस्थिति उत्पन्न हो जाये, जिसमें त्वरित कार्रवाई की आवश्यकता हैं तो राष्ट्रपति अध्यादेश प्रख्यापित कर सकता है। लेकिन संसद की कार्यवाही पुनः शुरू होने पर उक्त अध्यादेश को दोनों सदनों द्वारा छः सप्ताह के अंदर पारित कराना होगा। कुल मिलाकर कहें तो अध्यादेश की आयु मात्र छः महिने की है। इसलिए यहां कुछ गंभीर प्रश्न उभरना लाजमी है। देश में ऐसी कौन सी परिस्थिति थी जिसने सरकार को भूमि अधिग्रहण अध्यादेश लाने पर मजबूर किया? अध्यादेश के द्वारा केन्द्र सरकार कौन सी विदेशी पूंजीनिवेश को सुनिश्चित करना चाहती थी? अध्यादेश लाने के बाद कौन सी कंपनी ने पूंजी निवेश किया? ऐसा कौन सी विदेशी कंपनी है, जो यह जानते हुए देश में पूंजी लगायेगी कि यह अध्यादेश अगले छः महिने बाद स्वतः खारिज हो जायेगा?

इसमें गौर करने वाली बात यह है कि अध्यादेश पारित करने के लिए केन्द्र सरकार ने लोकतंत्र के मौलिक प्रक्रियाओं को पूरा ही नहीं किया। जबकि यह होना चाहिए था कि सरकार इसके लिए संयुक्त संसदीय समिति एवं सर्वदलीय बैठक बुलाकर उसमें चर्चा करने के बाद इस अध्यादेश को पारित करवाती। लेकिन  केन्द्र सरकार ने अध्यादेश को सिर्फ केन्द्रीय मंत्रीमंडल में पारित करने के बाद राष्ट्रपति से हस्ताक्षर करवाकर लागू कर दिया। निश्चित तौर पर यह लोकतंत्रिक प्रक्रियाओं का खुल्ला उल्लंघन है। देश के 125 करोड़ लोगों को प्रभावित करने वाला अध्यादेश को लागू करने का निर्णय सिर्फ मंत्रीपरिषद् कैसे ले सकता है? ऐसे देश में किसान और आदिवासी रैयत कैसे सशक्त हो सकते हैं जहां उनको अपनी राय रखने की आजादी ही नहीं है? क्या केन्द्र सरकार ने पूंजीपतियों के दबाव में गैर-लोकतंत्रिक कदम उठाया?

केन्द्र सरकार ने अध्यादेश के माध्यम से मूल कानून में भाग-तीन (अ) जोड़ दिया है, जो सरकार को यह शक्ति प्रदान करती है कि जनहित के वास्ते राष्ट्रीय सुरक्षा, ग्रामीण आधारभूत सरंचना निर्माण, गृह निर्माण, औद्योगिक क्षेत्र एवं पब्लिक प्राईवेट पार्टनर्शिप से संबंधित परियोजनाओं से मूल कानून के भाग-दो एवं तीन को सरकार मुक्त रखेगी। इन परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण के समय सामाजिक आंकेक्षण और परियोजना से प्रभावित लोगों से पूछने की आवश्यकता नहीं होगी। यह निश्चित तौर पर मूल कानून की आत्मा और लोकतंत्रिक मूल्यों की हत्या है। जमीन अधिग्रहण करते समय किसानों एवं आदिवासी रैयतों से क्यों नहीं पूछा जाना चाहिए जब औद्योगिक विकास के लिए नीति बनाते समय सरकार उद्योगपतियों को सभी मोर्चो पर सम्मिलित करती है? लोकतंत्र ऐसे सेलेक्टिव कैसे हो सकता है? क्या लोकतंत्र इस देश के किसान, आदिवासी रैयत और कृषक मजदूरों के लिए सिर्फ एक दिन का मामला है?

विकास परियोजनाओं का सामाजिक प्रभाव आंकेक्षण होना बहुत ही अनिवार्य हैं क्योंकि आजादी से लेकर वर्ष 2000 तक विकास परियोजनाओं से 6 करोड़ लोग विस्थापित व प्रभावित हुए हैं, जिनमें से 75 प्रतिशत लोगों का पुनर्वास अबतक नहीं हुआ है। भारत सरकार द्वारा आदिवासियों की भूमि वंचितिकरण एवं वापसी पर गठित ‘‘एक्सपर्ट ग्रुप’’ के अनुसार 47 प्रतिशत विस्थापित एवं प्रभावित होने वाले लोग आदिवासी हैं। देश के तीन बड़े विकास परियोजनाएं - टाटा स्टील, जमशेदपुर, एच.ई.सी., रांची एवं बोकारो स्टील लिमिटेड, बोकारो इस बात के गवाह हैं कि बिना सामाजिक आंकेक्षण किये इन परियोजनाओं को स्थापित किया गया। फलस्वरूप, इन परियोजनाओं से सबसे ज्यादा आदिवासी लोग प्रभावित हुए। उनकी पहचान, भाषा, संस्कृति, रीति-रिवाज एवं पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था समाप्त हो गई। अब वे शहरों में रिक्सा चालकों, मजदूरों एवं घरेलू कामगारों के भीड़ में शामिल हो चुके हैं।

कैग ने भी अपने रिपोर्ट में कहा है कि सेज परियोजनाओं में पुनर्वास की स्थिति ठीक नहीं है। उदाहरण के तौर पर देखें तो आंध्रप्रदेश के विशाखापटनम जिले के अतचयुतापुरम में वर्ष 2007-08 में एपाइक के सेज परियोजना के लिए 9287.70 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया गया, जिसमें 29 गांवों के 5079 परिवार विस्थापित हुए। लेकिन इनमें से सिर्फ 1487 परिवारों का ही पुनर्वास हो पाया है, जो स्पष्ट दिखाता है कि जमीन अधिग्रहण करने से पहले कंपनियां ठीक ‘‘लोकसभा चुनाव अभियान’’ की तरह वादा करते हैं लेकिन जमीन अधिग्रहण करने के बाद अपना वादा भूल जाते हैं और विस्थापितों को रोने-धोने हेतु छोड़ देते हैं। इस तरह से जमीन के मालिक नौकर बनने पर मजबूर कर दिये जाते हैं।

यह निश्चित तौर पर पांचवीं एवं छठवीं अनुसूचि क्षेत्र के तहत आने वाले राज्यों के लिए चिंता का विषय है, जहां संवैधानिक प्रावधान, पेसा कानून एवं जमीन संबंधी कानून इस बात पर जोर देते हैं कि आदिवासियों की जमीन गैर-आदिवासी नहीं खरीद सकते हैं और गैर-कानूनी तरीके से खरीदी गयी जमीन वापस की जा सकती है। ये कानून उनके संस्कृतिक पहचान, परंपरा, रीति-रिवाज एवं सामुदायिक अधिकारों की गारंटी देते हैं। इसी तरह वन अधिकार कानून 2006 व्यक्तिगत एवं सामुदायिक अधिकारों की गारंटी देती हैं। इसलिए सामाजिक अंकेक्षण एवं प्रभावित समुदायों के स्वीकृति के बगैर जमीन का अधिग्रहण नहीं किया जा सकता है। उदाहण के लिए झारखंड औद्योगिक नीति 2012 में कही गयी है कि राज्य सरकार कोडरमा से लेकर बहरागोड़ा तक सड़क के दोनो तरफ 25-25 किलोमीटर क्षेत्र में औद्योगिक काॅरिडोर का निर्माण करेगी। यहां सबसे ज्यादा जमीन आदिवासियों का ही अधिगृहित होगी। ऐसी स्थिति में क्या उनसे बिना पूछे उनके जमीन का अधिग्रहण करना उनके साथ अन्याय नहीं है?

सुप्रीम कोर्ट ने नियमगिरि पहाड़ से संबंधित ‘‘ओडिसा माईनिंग काॅरपोरेशन लि. बनाम वन एवं पर्यावरण मंत्रालय’’ के मामले पर सुनवाई करते हुए पेसा कानून 1996 की धारा - 4 (डी) को शक्ति से लागू करने की बात कही है, जिसके तहत ग्रामसभा को सर्वोपरि माना गया है, जिसके पास समुदाय की संस्कृतिक पहचान, परंपरा, राति-रिवाज, समुदायिक संसाधन एवं सामाजिक विवाद को हल करने की शक्ति है। इतना ही नहीं, आदिवासियों की सामाजिक-आर्थिक, शिक्षा एवं स्वास्थ्य की स्थिति पर अध्ययन करने के लिए गठित खाखा समितिने इस बात पर जोर दिया है कि आदिवासियों के लिए जमीन उनके सामाजिक-आर्थिक, धार्मिक पहचान, आजीविका एवं अस्तित्व का आधार है। ऐसी स्थिति में जमीन के बदले सिर्फ मुआवजा के रूप में पैसा दे देने से उनका अस्तित्व नहीं बच सकता है। इसलिए सरकार किसी भी मायने में इन आधिकारों को एक अध्यादेश के द्वारा नहीं छिन सकती है।

भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापना कानून में खाद्य सुरक्षा की गारंटी को सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया है, जिसके तहत यह कही गयी है कि किसी भी हालत में खेती की जमीन का अधिग्रहण नहीं करना है और अगर ऐसा करने की परिस्थिति आयी तो जमीन मालिकों को जमीन के बदले जमीन उपलब्ध कराकर उसे खेती योग्य बनाया जायेगा। लेकिन अध्यादेश के द्वारा इसे खारिज कर दिया गया है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि देश का कुल 55 प्रतिशत जनसंख्या एवं 91.1 प्रतिशत आदिवासी लोग अभी भी अपनी आजीविका के लिए कृषि पर पूर्णरूप से निर्भर है। विगत दो दशकों का अनुभव बताता है कि देश में खाद्यान्न उत्पादन में कमी आयी है। यह सन 1986-97 की तुलना में 1996-2008 में 3.21 प्रतिशत से 1.04 प्रतिशत की कमी आयी है। इसलिए खाद्य सुरक्षा के सवाल पर किसी तरह का समझौता नहीं किया जा सकता है।

केन्द्र सरकार ने अध्यादेश के द्वारा सरकारी आॅफसरों को सजा मुक्त कर दिया है। मूल कानून में यह प्रावधान किया गया था कि सरकारी विभाग द्वारा कानून का उलंघन करने की स्थिति में विभाग के वरिष्ठ पदाधिकारी सजा के भागीदार होंगे लेकिन अध्यादेश के द्वारा सरकार ने न्यायालय से यह अधिकार छिन लिया है। कानून का उल्लंघन करने के बावजूद आॅफसरों के खिलाफ बिना विभागीय अनुमति के कोई भी न्यायलय में मामला नहीं चल सकता है। लेकिन कानून में सजा का प्रावधान जरूरी इसलिए है क्योंकि सरकारी आॅफसरों के लापरवाही के कारण विस्थापितों को समय पर मुआवजा, पुनर्वास एवं पुनस्र्थापन सही ढंग से नहीं मिलता है। कई परियोनाओं में ऐसा भी देखा गया है कि विस्थापितों के जगह पर किसी अन्य व्यक्ति को मुआवजा की राशि दे दी गयी।

एक अन्य महत्वपूर्ण संशोधन सेक्शन 101 में किया गया है, जिसमें अवधि जोड़ दी गयी है, जिसमें यह व्यवस्था थी कि अधिगृहित जमीन का उपयोग उक्त परियोजना के लिए 5 वर्षों तक नहीं होने की स्थिति में जमीन मालिक को वापस किया जाना अनिवार्य था। देश में ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं जिसमें जनहित के नाम पर जमीन का अधिग्रहण किया गया लेकिन उपयोग नहीं होने के कारण कई दशकों तक बेकार पड़ा रहा। टाटा स्टील लि., जमशेदपुर में स्थापित स्टील प्लांट के लिए 12,708.59 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया था लेकिन सिर्फ 2163 एकड़ जमीन का ही उपयोग हुआ और शेष जमीन बेकार पड़ी रही, जिसमें से 4031.075 एकड़ जमीन गैर-कानूनी तरीके से सब-लीज में दे दिया गया। इसी तरह एच.ई.सी. रांची के लिए वर्षा 1958 में 7199.71 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया गया, जिसमें से सिर्फ 4008.35 एकड़ जमीन का ही उपयोग मूल मकसद के लिए किया गया, 793.68 एकड़ जमीन गैर-कानूनी तरीके से निजी संस्थानों को सब्लीज में दे दी गयी एवं शेष जमीन अभी तक उपयोग रहित हैं।

कैग द्वारा जारी ‘‘विशेष आर्थिक क्षेत्र’’ प्रगति प्रतिवेदन 2012-13 देखने से स्पष्ट होता है कि भूमि अधिग्रहण अध्यादेश मूलतः अंबानी, अदानी जैसे उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए लाया गया है, जिन्होंने ‘‘विशेष आर्थिक क्षेत्र’’ के निर्माण हेतु भूमि अधिग्रहण कानून 1984 की धारा - 6 के तहत ‘‘जनहित’’ के नाम पर अत्याधिक जमीन का अधिग्रहण किया लेकिन उसका समुचित उपयोग नहीं कर पाया है। ऐसी स्थिति में अधिगृहित जमीन मूल रैयतों को वापस देना पड़ सकता है। चूंकि इन्ही औद्योगिक घरानों ने लोकसभा चुनाव में भारी पैसा लगाकर नरेन्द्र मोदी को सिंहासन पर बैठाया था इसलिए अब केन्द्र सरकार अध्यादेश के द्वारा उनकी जमीन बचाकर अपना कर्ज उतारना चाहती है।

कैग प्रतिवेदन के अनुसार, सेज कानून के लागू होने से अबतक 576 सेज परियोजनाओं की स्वीकृति प्रदान की गयी, जिसके तहत 60374.76 हेक्टेअर जमीन का अधिग्रहण हेतु स्वीकृति मिली। इनमें से मार्च 2014 तक 392 सेज परियोजनाओं के लिए 45,635.63 हेक्टेअर जमीन पर नोटिफिकेशन जारी किया गया। लेकिन 392 में से सिर्फ 152 परियोजना लग पायी है, जिसमें 28488.49 हेक्टेअर जमीन शामिल है। इसके अलावा शेष 424 सेज परियोजनाओं को दी गयी 31886.27 हेक्टेअर जमीन यानी 52.81 प्रतिशत परियोजनाओं में कोई काम आगे नहीं बढ़ा, जबकि इनमें से 54 परियोजनाओं का नोटिफिकेशन 2006 में की गयी थी। यानी मूल कानून के अनुसार इन परियोजनाओं की अवधि समाप्त हो चुकी है इसलिए अधिगृहित जमीन मूल रैयतों को वापस करना पडेगा।

कैग रिपोर्ट इस बात का भी खुलासा करती है कि 392 नोटिफाईड सेज परियोजनाओं में से 1858.17 हेक्टेअर जमीन से संबंधित 30 सेज परियोजनाएं अंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिसा एवं गुजरात से संबंधित हैं, जिनमें डेवलाॅपर्स ने कुछ भी कार्य नहीं किये है और जमीन 2 से 7 वर्षों तक बेकार पड़ी हुई है। इतना ही नहीं कैग रिपोर्ट यह भी खुलासा करती है कि इन राज्यों में 39245.56 हेक्टेअर जमीन में से 5402.22 हेक्टेअर जमीन को डिनोटिफाईड किया गया और दूसरे आर्थिक कार्यों में लगाया गया, जो सेज के उद्देश्य के खिलाफ है। कैग ने सेज परियोजनाओं के लिए अधिगृहित जमीन का उपयोग नहीं करने के लिए रिलायंस, डीएलएफ, एस्सार की खिचाई भी की है।

निश्चित तौर पर केन्द्र सरकार ने एक षडयंत्र के तहत भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के द्वारा भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनव्यर्वस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता अधिकार अधिनियम, 2013’ के मूल उद्देश्य को ही समाप्त कर दिया है, जिसे परियोजना प्रभावित लोगों के अधिकारों को सुनिश्चित करने, भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनस्र्थापना में पारदर्शिता लाने के लिए लागू की गयी थी। इस कानून के माध्यम से देश के विकास, राष्ट्रहित एवं आर्थिक तरक्की के नाम पर विस्थापितों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय को न्याय में बदलने का वादा किया गया था। इसलिए भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को वापस लेना चाहिए क्योंकि इससे जमीन लूट को बढ़ावा मिलेगी जिसका किसान, आदिवसी रैयत एवं कृषक मजदूरों पर विपरीत असर पड़ेगा। 


Adivasi Bachavo Andolan ! (VDO/News)

Adivasi Bachavo Andolan 

A) Home Page : www.jago.adiyuva.in 

B) PhotoGraph : 

    1) At facebook Album:  Click here 2) At Google plus : Click here 



C) Vedio News & info  : Click Here 


शू …आदिवासींनो शांत झोपा !

शू …आदिवासींनो शांत झोपा !
ठाणे जिल्ह्यातील विक्रमगड तालुक्यात आदिवासी उपयोजनेतून बांधण्यात आलेल्या सूर्या धरण प्रकल्पाचे पाणी फक्त पूर्वीच्या जव्हार व आताचा विक्रमगड, डहाणू आणि पालघर या तालुक्यासाठी राखीव होते. परंतु शासनाने या धरणाचे पाणी आता वसई - विरार महानगरपालिका (185 mld) व मिरा - भांईदर महानगरपालिकेला (403mld) देण्याचा निर्णय घेतला आहे. त्या साठी 1325.77 कोटी मंजूर केले आहेत !
हा प्रकल्प तुझे घर, पाडा, गाव, गावदेव बुडवून बनवला पण तू ३० वर्षा पासून तहानलेला. येथून २किमी वर असलेले तुझे आदिवासी पाडे कोरडे !
आणि आता सुसरी, पिंजाळ तुमचे पाणी शहरात पळवणार !
निसर्गाचे जतन करायचे असेल तर ५वी अनुसूची आणि PESA नुसारT TSP चा “स्वायत्त आदिवासी जिल्हा” हाच एक उपाय
Swayatt Adivasi Jilha Kruti Samiti - Thane



क्रांतिसूर्य बिरसा मुंडा

आज आदिवासी वीर बिरसा मुंडा यांची जयंती आहे. आपणा सर्वांना भगतसिंग,राजगुरू ,चंद्रशेखर आझाद यांचा इतिहास माहित आहे पण आपल्यापैकी किती जण बिरसा मुंडा यांचा इतिहास जाणतात …?चला आज क्रांतिसूर्य बिरसा मुंडा यांच्या जयंती निमित्त त्यांचा साहसी इतिहास थोडक्यात जाणून घेवूयात !
जन्म _ आदिवासी वीर बिरसा मुंडा यांचा जन्म १५ नोव्हेंबर १८७५ मध्ये सध्याच्या झारखंड राज्याच्या रांची जिल्ह्यातील अलिहत गावामध्ये एका झोपडीत झाला . त्यांच्या आईचे नाव करमी हातु व वडीलांचे नाव सुगना मुंडा असे होते .
शिक्षण _ बिरसा लहानपणापासूनच खूप कुशाग्र बुद्धीचे व चपळ होते . त्यांचे प्राथमिक शिक्षण सलगा या गावातील त्यांच्या मावशीकडे झाले .पुढे ते मिशनरी शाळेत चाईसाबा येथील जी. सी. एल. मिडल स्कूल मधून त्यांची उच्च माध्यमिक परीक्षा पास केली . बिरासांना येथेच मिशनऱ्यांच्या दुष्ट्चक्रांबद्दलचा पहिला अनुभव आला .
मिशनरी आदिवासींचे शोषण करतात म्हणून त्यांनी मिशनरी शाळा सोडून दिली. आणि त्यांचे शिक्षण अर्धवट राहिले .
विवाह _त्यानंतर १८९ ० -१८९४पर्यंत ते बंद्गाव येथेच राहिले ,पुढे त्यांचा विवाह हिराबाई नावाच्या कन्येशी झाला परंतु दुर्दैवाने लवकरच त्यांच्या पत्नीचा मृत्यू झाला .
बिरसा मुंडा ते भगवान बिरसा _ बिरसांना शिक्षणाबरोबरच संगीत, नृत्य यांची सुद्धा आवड होती .ते उत्तम बासुरी वाजवायचे, त्यांचा आवाज भारदस्त होता. पुढे हाच आवाज आदिवासींच्या अन्यायाविरुद्ध उठला .ते रानात गुरे चरायला नेत . त्यामुळे निसर्गात उपलब्ध असलेल्या वनऔषधीबद्दल चांगलेच ज्ञान होते ,ते आजारग्रस्त लोकांना विशिष्ट प्रकारची जडीबुटी देवून त्यांचा आजार बरा करत असत . म्हणूनच लोक त्यांना 'भगवान बिरसा' म्हणू लागले . एकदा पावसाळ्यात कडाडती वीज बिरसांवर पडली. परंतु बिरसांना कसलीही इजा झाली नाही, याउलट त्यांच्या आजूबाजूची झाडे विजेमुळे खाक झाली . या घटनेपासून इंग्रजही आश्चर्यचकित झाले व "बिरसा god है" असे ते मानू लागले,व तसे त्यांनी नमूदही करून ठेवले आहे .
कार्य _सावकार व ठेकेदारांनी आदिवासींच्या शोषणाची सीमा पार केली होती . आदिवासी जमिनीचे मूळ मालक असूनही जमीनदार व सावकार जबरदस्तीने त्या जमिनीवर ताबा मिळवून बसले होते . पण त्याबद्दल चकार शब्दही न काढण्याचा आदेश इंग्रजांनी दिले होते,परंतु बिरासांना ते सहन झाले नाही बिरासांनी लोकांमध्ये जागृती करण्यास सुरवात केली ,ते लोकांना म्हणत कि "तुमच्या जमिनी धूळ वाऱ्यासारख्या उडून गेल्या आहेत,स्वभिमानासोबत तुमचा आत्मविश्वासही संपला आहे,जर तुम्ही तुमचा आत्मविश्वास परत जागृत नाही केला तर तुम्ही तुमच्या आया बहिणींची अब्रु कशी वाचवाल …… ?"या वाक्यांचा लोकांच्या मनावर खोल परिणाम झाला . व लोकांमध्ये आत्मविश्वास जागृत होण्यास सुरवात झाली.
उलगुलान _ सन १८६९मध्ये वन संरक्षण कायदा लागू करण्यात आला,त्यामुळे जंगलावर होणारी उपजीविका बंद झाली . आदिवासींवर मोठे संकट उभे राहिले. या अन्यायाविरुद्द बिरासांनी १८९०मध्ये व्यापक क्रांती 'उलगुलान 'ची घोषणा केली . शस्त्रबळ तयार करून शत्रूंना ठार केले .
सन १८७५ मध्ये 'स्वराज्य हा माझा जन्मसिद्ध हक्क आहे,आणि तो मी मिळवणारच !'हि लोकमान्य टिळकांची घोषणा देशभरात पोचली पण नव्हती ,त्याही आधीपासून बिरसांनी स्वराज्याची घोषणा करून इंग्रजी सत्तेला आवाहन केले होते हे इतिहासातील खूप मोठे सत्य किती जणांना माहित आहे … ?
बिरसांनी १८९५मध्ये समाजसुधारणेचे अभियान आपल्या हातात घेतले,जंगल,जमीन संपत्ती हा आमचा अधिकार आहे ,ते आमच्या उपजीविकेचे साधन आहे ,यासाठी सर्व आदिवासींनी एकत्र येवून लढायचे आवाहन केले . त्यांनी न्याय व अधिकारासाठी शस्त्र हाती घेतेले. जंगल राज्याची घोषणा करून ते आदिवासींचे महानायक बनले . यामुळे इंग्रज सरकार त्यांच्या मागे लागले परंतु त्यांनी आपले कार्य चालूच ठेवले. बिरसांनी अनेक अनुयायी तयार केले. बिरसा व त्यांच्या अनुयायांनी अन्यायी सावकार व जमीनदारांच्या घरांना आग लावून दिली. हि बातमी पोलिसांनी जिल्हाधिकार्याला कळवताच बिरासांना अटक करण्याचे आदेश देण्यात आले . ९ ऑ. १८९५ ला बिरसा व त्यांच्या वडिलांनाही ताब्यात घेण्यात आले. आणि ख्रिस्ती पाद्रींच्या साक्षीवरून त्यांना २ वर्ष कारावास व ५० रु. दंड ठोठावण्यात आला.
३० नोव्हे. १८९७ रोजी बिरसा तुरुंगातून बाहेर आले ,त्या वेळी आदिवासी समाजाची केविलवाणी स्थिती बघून ते पेटून उठले व त्यांनी स्वावलंबन व स्वाभिमानासाठी उलगुलान ची घोषणा केली.
बिरसा हे उत्तम योद्धा होते.एक कुशल प्रशासक होते. फेब्रु. १८९८मध्ये बिरसांनी आपल्या अनुयायांच्या सोबत डुंबारी बुरुज या पर्वताच्या पायथ्याशी सभा बोलावली, व १८९९मध्ये नाताळचा पहिलाच दिवस हल्ल्याचा दिवस म्हणून ठरवला. या हल्ल्यामध्ये त्यांनी पोलिस चौकी लुटायचे ठरवले,नाताळच्या रात्री आपल्या साथीदारांच्या तीन वेगवेगळ्या तुकड्या बनवून वेगवेगळ्या जागेवर हल्ले चढवले. फादरच्या घरावर हल्ले करून फादर कारवेरी व फादर हाफमान यांच्यावर बाण चालवले.
जाने. १९०० मध्ये रांचीच्या इंग्रज अधिकाऱ्यांना बिरासांच्या या हल्ल्याची माहिती मिळाली आणि जाने. १९०० मध्ये ११. वाजता इंग्रजांनी डुंबारी बुरुजावर गोळीबार सुरु केला, तेव्हाच बिरासांचे अनुयायी त्यांच्या नावाचा जयजयकार करत धनुष्यबाण व दगडफेक करत त्यांचा प्रतिकार करण्यास सुरवात केली. त्यावेळी टेकडीवर २०००पेक्षा जास्त लोकांचा जमाव उपस्थित होता,यात स्त्रिया व लहान मुलांचाही समावेश होता. या नरसंहारात २००पेक्षा जास्त आदिवासी मारले गेले,व बाकीच्यांना जबरदस्तीने ख्रिश्ती धर्म स्वीकारण्यात भाग पाडले गेले. हा नरसंहार 'डुंबारी बुरुज नरसंहार' म्हणून ओळखला जाऊ लागला.
या नरसंहारानंतर ७जाने. १९००मध्ये पोलिसांनी धरपकड सुरु केली, व पुढे ३फेब्रु. १९००मध्ये बिरसांनी आपल्या ८० अनुयायांसमवेत स्वतःला पोलिसांच्या स्वाधीन केले. या वेळेस तेथे उपस्थित आदिवासी बांधवांना बिरासांनी माधारी फिरण्यास व आपल्या अधिकारांसाठी लढण्याचा उपदेश केला.
त्यानंतर वयाच्या केवळ २५व्या वर्षी तुरुंगवास भोगत असताना कॉलाराने ग्रस्त होवून बिरासांची प्राणज्योत मालवली. परंतु येथेही इंग्रजांचे कपट दिसून येते,बिरासांच्या अनुयायांच्या म्हणण्यानुसार बिरासांना तुरुंगात कॉलराच्या औषधाऐवजी विष देण्यात आले होते.
बिरासांना खात्री होती कि त्यांनी सुरवात केलेल्या उलगुलान नावाच्या वादळाचा कधीच अंत होणार नाही,बिरसा अमर आहेत व आपल्यासाठी आणि येणाऱ्या अनेक पिढ्यांसाठी आदर्श आहेत .
बिरासंच्या 'उलगुलान' ला हि बिरसाइतकेच महत्व प्राप्त झाले,उलगुलान मध्ये समाजहीत तसेच मातृभूमीच्या रक्षणासाठी लढणे आदि तत्वे समाविष्ट आहेत ,म्हणूनच लोक बिरासांना धरती आबा म्हणून संबोधतात.
आजही या महानव्याक्तीच्या पवित्र स्मृती झारखंड राज्यात आहेत. झारखंड राज्याने रांची airport व रेल्वे स्थानकाला 'बिरसा मुंडा' हे नाव देवून त्यांच्या महान कार्याला गौरविले आहे.
या महान आदिवासी वीराला आयुश तर्फे शतशः नमन !जय बिरसा !

शब्दांकन : संचिता सातवी

संदर्भ : आदिवासी वीर - जेलसिंग पावरा

Warli Art Foundation - Artist Registration


आदिवासी वारली चित्रकला । चित्रकार नोंदणी अर्ज

आदिवासी संस्कृती आणि परंपरा आपली ओळख आहे, आजही जागा पुढे आदर्श आहे. आपली ओळख टिकवून आदिवासी चित्रकलेचा जगाच्या पाठीवर प्रसार करण्याकरिता आदिवासी समाजातूनच प्रयत्न झाले पाहिजेत, त्यासाठी आपण आदिवासी समाजातील एकात्मता आणि एकता वाढवून प्रयत्न करूयात. आदिवासी समाजाला आणि आदिवासी कलाकारांना मेहनतीचा योग्य मोबदला मिळावा या साठी एकत्रित प्रयत्न करूयात. संपर्कात या

Please submit online form at : http://www.warli.in/2013/01/warli-art-foundation.html

About Maharashtra tribes

The Scheduled Area notified by the Government of India consists of 5809 villages and 16 towns in 12 districts covering an area of 46,531 km2, which is about 15.1% of the area of the State. These districts are Thane, Pune, Nashik, Dhule, Nandurbar, Jalgaon, Ahmednagar, Nanded, Amravati, Yeotmal, Gadchiroli and Chandrapur. The Tribal Sub-Plan (TSP) area covers the scheduled area. In addition, the State Government felt that 773 villages in the districts of Raigad, Bhandara, Gondia, Chandrapur, Yeotmal and Pune also deserved to be extended the benefits of TSP, though these villages did not strictly satisfy the criteria laid down by the Government of India for inclusion in TSP area. These areas were designated as Additional Tribal Sub-Plan (ATSP) areas. In addition, the Government of India had also decided that a group of villages having a total population of 10,000 or more with more than 50% tribal people should be brought under the Modified Area Development Approach (MADA). Similarly, a group of villages having a total population of more than 5000 with more than 50% tribals are to be constituted into Mini-MADA pockets. In all 1754 villages in the State have been included in MADA and Mini-MADA pockets. All the benefits available to the tribals in the TSP areas as approved by the Government of India have been extended to the tribals in the ATSP, MADA and Mini-MADA areas.


The population of scheduled tribes in Maharashtra as per the 1991 census was 73.18 lakh (Maharshtra has the second highest tribal population in the country, next to Madhya Pradesh having a population of 154 lakh). 49.0 % of the tribals live in scheduled areas (main TSP area), 2.6% in ATSP areas, 6.8% in MADA and Mini-MADA pockets. The remaining 41.6% of the tribals live outside all these areas.


There are 47 scheduled tribes in the State. The tribes each having a population over one lakh as per the 1981 census (with population in lakh) are:


• Gond 11.63


• Bhil 9.93


• Mahadeo Koli 7.87


• Warli 3.61


• Kokna 3.53


• Thakur 3.23


• Halba 2.43


• Andh 2.32


• Koli Malhar 1.77


• Katkari 1.75


• Kolam 1.18


• Korku 1.16


• Gamit 1.11


we are the Adivasi from Thane!

 

There was a time when the Indian sub-continent was blessed with an amazing variety of natural life, made possible by diverse geographical features and climatic conditions. Innumerable early communities, which we now refer to as tribes or adivasis, lived as an integral part of Nature, harvesting its bounties. Even though each tribe had its own lifestyle, specific habitat, food habits, customs and rituals, it shared a common divinity with the others. Nature was their God, their guide, their very reason for being.

However, as we all are so acutely aware, radical change has mutated the sub-continent. The abundance of natural life has been depleted and towns, cities and metropolises have mushroomed. Even though these changes have happened, tribal communities still persist, holding on to their way of life, in settlements spanning the length and breadth of the country – sometimes living in little pockets very close to highly civilized and modern cities, sometimes far away in isolated cloisters, along the sea coast, in dense forests or snow clad mountains. They are a vital part of the country’s living heritage.

In the state of Maharashtra alone there are communities belonging to forty-seven different tribes living along the western coast of India. This accounts for 9% of the total population and ranks third with respect to the tribal population in the country. Few of the communities living here are the Malhar koli, Warlis, kokana, katkari. Although in recent years their decorative art has been celebrated and has gained wide acceptance, little is known about these self-effacing people. Now onwards these tribes will be refer by Adivasi in following paragraphs in this article

We are an indigenous tribe of people who have lived in the Thane district of Maharashtra for centuries. We are originally hunters/farmers but with deforestation and access denied to the existing forests, paddy farming is now the main stay of their existence. Even today, their entire life revolves around nature. Seasons dominate every aspect of their life with the year getting divided into various periods of rice growing. All the work is done manually with no help whatsoever of machines. The entire family, including women and young children, get engrossed in the work every day throughout the year, leaving old women at home to look after the babies.

Our community has developed an astonishing set of eco-indicators with the help of which they can predict the coming of the monsoon. Minute changes in sunrise and sunset and the cry of a particular bird, herald the onset of the rainy season – ushering in a period of plenty and cause for joy. The first rain in June announces the birth of a new cycle of life. The seeds are sown and the first seedling that sprouts is celebrated as a gift from Dharitri (mother earth) with a rite known as Koli Khaane(Kaavali). The seedling is cooked into a curry and shared by all the family members. Transplanting of seedlings takes place after this rite has been performed.

From June to September, we are busy in their fields, managing water, weeding, tightening plants that have become loose, chasing away rodents and cutting the abundance of grass and storing them for their cattle. Nature responds and by September the crops are standing tall in the fields. We then harvest the crops, but only after Saavari the field Goddess is thanked for her generosity.

After harvesting, its time to celebrate Diwali. Entire clans come together under the same roof and prepare to eat the newly harvested grain for the first time. This is accompanied by joyous dancing, singing, drinking and merry-making. More celebrations follow with the propitiation of Vaghadeva (the Tiger God), Kaansaari (the Corn Goddess) and a host of other Gods and Goddesses. The harvest is threshed and the new grain is brought home and stored in a kaanagii which is a circular rice bin.

By January, preparations are afoot for marriages in the family. All our Adivasi marriages take place in winter and involve at least three days of feasting and rituals. The whole village helps out in the preparations. Women contribute each day by helping in the collection of fuel wood, water storage and cooking. When we visited Nalshet village about this time, we met Shantaram who was even brewing liquor himself for the celebration of his son’s marriage. A talented artist, he has now become a businessman, promoting and selling his art to city dwellers with the help of well-wishers. Nevertheless, he still prefers his way of life and continues to live in the village, his family supporting him in all his endeavours.

As summer sets in, the marriage season comes to an end and Holi is celebrated. This festival marks the death of one cycle of life and we start preparing the earth for the birth of the next cycle, with the collection of dry leaves for the preparation of rab, the organic fertilizer to be spread over the land.

We Adivasi abodes, food habits and clothing point to an inherent austerity. Our homes are windowless spacious simple structures of wood, bamboo, karvi reeds, earth and cow dung with roofs of straw and dried leaves. Inside, the rooms are dark, empty and bare, except for a handful of possessions. Although we share our living spaces with our domestic animals like dogs, goats, hens and even cows cleanliness is overtly apparent. Surprisingly, there is no furniture and no storage containers like boxes, cupboards or trunks. The only food stored is the rice in the kaangiis. All the clothes that we possess hang on a rope tied across the room. But nowadays this picture change for few peoples

Our food is simple, varied and nutritious and consists of rice along with pulses like vari, udid, tur and chavli. This is accompanied by fresh and dried fish. It is only on festive days that they include the meat of a fowl or goat. Our clothing is also scanty and minimal, yet practical – allowing for free movement. Men wear a loin cloth and sometimes a thin kurta and a turban. Women wear a nine yard sari which is tightly wound around their waist and thighs. The upper part of the body is covered by a choli and a piece of cloth called the padar. Little girls wear skirts and cholis while little boys wear shorts or nothing at all. The women’s clothes are brightly coloured and on festive days they look gorgeous with their hair well oiled and decorated with flowers, intricate pins and coloured ribbons. But nowadays many people’s wears the modern dress codes

Apart from the clothes we wear, we Adivasi seem to have no material possessions. Except for a single gold bead threaded in black beads given at the time of marriage, the women have no gold or silver jewellery. Young children now go to government schools in the nearby villages, but very few of them get good chance for quality education, if any, pursue higher education. Even though there is no doctor in the village we people are relatively healthy. This is because traditional knowledge about medicinal plants is passed on down generations and is still practiced. Shantaram’s mother who should roughly be in her sixties, had taken the cattle grazing when we visited and when she made an appearance two hours later was bubbling with energy with no traces of her long outing in the hot afternoon sun. I later learnt that her mother-in-law was still very healthy and was away at the time visiting her daughter in a far away village. The women proudly explained to us that all babies in the village were born in our own homes and they had never had a case of either baby or mother suffering from any infections.

The Adivasis are well known today amongst elite circles for their unique form of decorative art. We paint life with an intricacy of detail and an amazingly beautiful way of depicting every aspect that surrounds their daily routine. Traditionally, they painted on walls during the time of celebrations or for auspicious occasions but gradually over the years the images and themes were also transferred to small curios made of bamboo, cloth, pots of mud and dried bottle gourd. One of the main themes that occur in their paintings is that of people dancing in spirals and open-ended circles. For the Adivasi, time is akin to a circle – with cycles within cycles repeating themselves endlessly. They see themselves as joyous dancers in this time frame. This cyclic nature of time is played out in all spheres of their life and can be best seen in their annual cycle of work, thanksgiving, enjoyment and work again. Their art also expresses an interesting aspect of their inherent philosophy, that of austerity. All their stories, with its various moods and nuances are expressed with just two basic colours – the brown of the earth and the white of the rice paste.

Our paintings are well known by world as “Warli painting”. Our paintings prominently depict tigers, corn fields, rats, cockroaches, horses, snakes, peacocks and other manifestations of nature. This reflects the unique relationship that we share with Nature. Personified as Hirva, Nature is seen as the provider of all our requirements and Warlis identify ourselfs with Pardhi, the hunter companion of Hirva and see ourselves as protectors of Nature. Very lees peoples aware about fact that Warli art, the tribal art is art followed & believed by all tribal’s in thane district. Named as Warli art it does not mean that is only practiced by Warli tribe

This holistic view of life is expressed through many small daily practices. Adivasi previously did not plough the land, as this would hurt Dharitri or mother earth. Till very recently, we refused to use synthetic fertilizers, even though it was highly subsidized and at times distributed free. The adivasi knew with their inherent wisdom, that this would dry up the earth. While cooking, bhakris are only slightly roasted, as over roasting and over cooking would result in the grain Goddess Kansaari’s back getting burnt. Adivasi do not milk cows, their reasoning being that the cow’s milk is for her calf. The list is long.

A story by Chandrakant, a Adivasi, brings out the relationship between his tribe and the rest of Nature. The story is that of a farmer who settled on a handsome price for his bull with a neighbouring farmer. After the deal was fixed, the seller offered a bidi to the prospective buyer. The buyer refused saying that he did not smoke. The first farmer then refused to sell his cow to the non-smoker and set out to find another buyer. The story kept repeating itself and the tired farmer kept on negotiating with buyers till he found a bidi smoker to whom he sold his bull. When asked about this strange behaviour the farmer reasoned that if a person did not stop for a smoke, the bull would never get any time to rest either. So though the price was good, he would not sell his animal to such a person.

A story told by Jivya Mashe shows their strong belief that Nature will always care for them. The crops had failed one year and some Adivasi asked a rich farmer to give them food. The rich farmer was apologetic, saying that he had just enough for his own family and he would not be able to help them. He was surprised when the Adivasi cheerfully told him not to worry as they had bearded friends in the forest, who would give them enough food. The farmer was curious to know who these bearded benefactors were. He followed the Adivasi as they moved expertly into the jungle, pulling up long hairy tubers of yam and suran from the ground. These were their bearded friends. The forest is full of friends and the Adivasi will only take as much as is essential for survival.

Between 1800 and 1947, Thane was under British rule. The Adivasi was marginalized and impoverished on many fronts. One of the most important policy decisions that affected them was that their community land was converted into ownership land, to facilitate tax collection. Business communities from Gujarat and Rajasthan quickly moved in and claimed ownership of land and the Adivasis were reduced from being the rightful owners to lowly paid labourers on their own land.

In 1807, The East India Company passed a proclamation that transferred the rights over all community forests in the country to the East India Company while in 1878, the British passed an act that made the Adivasi an illegal trespasser in his own forest. These policies changed the status of this tribal group, from a self sufficient and independent tribe, with adequate resources and unlimited wisdom, to a tribe of serfs and bonded labourers. Even today, the Adviasis continue to fight to regain access to a tiny fraction of the land that was theirs, and access to the forest that they have lived off and protected for ages.

The life-support system of the Adviasi is linked with that of the forest. The Adivasi is dependent on his forest for anna, arogya and aasra (food, wellbeing and security.) The current paradigm of development and non-inclusive forest policy has put the Adviasis through pain and alienation. The impact of continually being marginalized is best illustrated through the shift in the Adivasi-Tiger relationship. The traditional relationship of the Adivasi with the tiger is one of respect. When a Adivasi heard the roar of a tiger, he would say ‘paaona aala’ meaning ‘the guest has come’. The footprints of this visiting God in a field was celebrated by breaking a coconut and smearing the space with gulal. The presence of this footprint was welcomed as a sign of good harvest. Today, the Adviasis are being denied their rights to forest and land in the name of providing protection to the tiger and the forest. It is time that these gentle people are given back their rightful place in the forest, as ‘Jungle cha raja’ or king of the jungle. It is time Pardhi (hunter)was reunited with Hirva (nature).

The biggest cultural lost to Adivasi community is the impact of missionaries in rural area, the peoples influence by Christianity creates partitions in adivasi community. This will be great problem for adivasi community in near future. But new generation nowadays aware about the missionaries’ hidden agenda & they are openly support the pure tribal unity without any external interference.

Now days many of us are highly qualified across the professions. Many of us are staying away from hometown for their education or career. So we are following AYUSH to connect peoples across distance. AYUSH plays great role to utilize our tribal talent to guide our new generation. We have active presence on internet & got connected with different peoples. This will help us to understand each other.

All educated tribal’s should come together for our community development work, is today’s need

We hope all tribal’s will come together at common stage & ensure our tribal success!

Jai adivasi!

 

 

Proposed Career Guidance Program (Seeking Support)

Find us on Facebook

International Day of the World's Indigenous Peoples

AYUSH @ google group